बिहार की राजनीति में एक अहम संगठनात्मक फैसला सामने आया है। चुनावी रणनीतिकार से नेता बने प्रशांत किशोर की पार्टी जन सुराज ने विधानसभा चुनाव में मिली हार के बाद सभी जिला कार्यकारिणी समितियों को तत्काल प्रभाव से भंग कर दिया है। इस फैसले की जानकारी पार्टी ने 22 दिसंबर 2025 को अपने आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल के माध्यम से सार्वजनिक की।

पार्टी की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि संगठन को जमीनी स्तर पर नए सिरे से मजबूत करने के उद्देश्य से यह कदम उठाया गया है। इसके साथ ही पार्टी ने 12 वरिष्ठ राज्य स्तरीय नेताओं को विभिन्न जिलों का प्रेक्षक नियुक्त किया है, जो संगठन के पुनर्गठन की जिम्मेदारी संभालेंगे।

विधानसभा चुनाव में करारी हार

नवंबर 2025 में हुए बिहार विधानसभा चुनाव में जन सुराज पार्टी का प्रदर्शन अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं रहा। पार्टी राज्य की लगभग सभी 243 सीटों पर चुनाव मैदान में उतरी थी, लेकिन एक भी सीट जीतने में सफल नहीं हो सकी। पार्टी को कुल 3.44 प्रतिशत वोट शेयर मिला और अधिकांश उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई।

हालांकि, चुनावी आंकड़ों के अनुसार लगभग 35 सीटों पर जन सुराज के उम्मीदवारों को मिले वोट विजयी उम्मीदवारों के जीत के अंतर से अधिक थे, जिससे यह संकेत मिला कि पार्टी ने कई स्थानों पर चुनावी समीकरणों को प्रभावित किया।

संगठन के पुनर्गठन की प्रक्रिया

पार्टी की ओर से जारी पोस्ट में दो आधिकारिक दस्तावेज साझा किए गए हैं। पहला दस्तावेज जिला समितियों को भंग करने से संबंधित है, जबकि दूसरे में जिला प्रेक्षकों की सूची जारी की गई है। इन प्रेक्षकों को पटना, समस्तीपुर, मुजफ्फरपुर सहित कई जिलों में संगठनात्मक गतिविधियों की निगरानी की जिम्मेदारी दी गई है।

जन सुराज नेतृत्व का मानना है कि संगठनात्मक कमजोरियों की पहचान कर उन्हें दूर करना भविष्य की राजनीतिक रणनीति के लिए आवश्यक है।

प्रशांत किशोर का राजनीतिक सफर

प्रशांत किशोर देश के जाने-माने चुनावी रणनीतिकार रहे हैं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और ममता बनर्जी जैसे नेताओं के अभियानों में अहम भूमिका निभा चुके हैं। उन्होंने अक्टूबर 2024 में जन सुराज पार्टी की स्थापना की और 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव को अपनी पहली बड़ी राजनीतिक परीक्षा बनाया।

पार्टी ने शिक्षा, रोजगार, पलायन, स्वास्थ्य और सुशासन जैसे मुद्दों को अपने अभियान का केंद्र बनाया, लेकिन यह एजेंडा वोटों में तब्दील नहीं हो सका।https://x.com/jansuraajonline/status/2003121838415823344

आगे की राह

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह फैसला हार से सीख लेकर संगठन को मजबूत करने की दिशा में उठाया गया कदम है। बिहार की राजनीति में जातीय समीकरण और स्थापित दलों की मजबूत पकड़ के बीच किसी नई पार्टी के लिए खुद को स्थापित करना एक लंबी प्रक्रिया मानी जाती है।

जन सुराज पार्टी फिलहाल सामाजिक मुद्दों पर सक्रिय बनी हुई है और लगातार बिहार के विकास, शिक्षा व्यवस्था, रोजगार और पलायन जैसे विषयों पर अपनी बात रख रही है। पार्टी नेतृत्व का दावा है कि यह संघर्ष दीर्घकालिक है और संगठन को भविष्य के चुनावों के लिए तैयार किया जा रहा है।

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