बिहार में 64.69% वोटिंग — जनता ने रचा नया रिकॉर्ड

बिहार विधानसभा चुनाव के पहले चरण में जनता ने लोकतंत्र के इस त्योहार को सच्चे मायनों में मना दिया।राज्य में 64.69 प्रतिशत वोटिंग हुई  यानी आज़ादी के बाद अब तक का सबसे ज़्यादा मतदान। सुबह से ही वोटिंग बूथों पर भीड़ उमड़ पड़ी थी। जवान हों या बुजुर्ग, महिलाएँ हों या पहली बार वोट देने वाले युवा सबमें जबरदस्त जोश नजर आया। पहले चरण में 18 जिलों की 121 सीटों पर मतदान हुआ और 1314 उम्मीदवारों की किस्मत ईवीएम में कैद हो गई। ज़्यादातर जगह वोटिंग शांतिपूर्ण रही। कहीं-कहीं मशीन में दिक्कत आई तो लोग धैर्य से इंतजार करते रहे।

इन जिलों में सबसे ज़्यादा वोटिंग हुई?

इस बार बिहार के कई जिलों ने रिकॉर्ड तोड़ वोटिंग की। मुज़फ़्फरपुर 70.96% ,समस्तीपुर 70.63% , अरवल 69.03% ,सहरसा 67.95%, वैशाली: 67.37% ये आंकड़े दिखाते हैं कि ग्रामीण बिहार अब पहले से कहीं ज़्यादा जागरूक हो गया है।

इन जिलों में वोटिंग कम रही?

कुछ जिलों में वोटिंग का उत्साह थोड़ा कम नजर आया। बक्सर  61.73% भोजपुर: 58.27% पटना 58.40% हालाँकि, इन जगहों पर भी पिछले चुनाव से सुधार देखने को मिला।

रिकॉर्ड वोटिंग क्यों मायने रखती है

मुख्य निर्वाचन अधिकारी के मुताबिक, यह वोटिंग 2015 की तुलना में लगभग 8.5 प्रतिशत अधिक रही। 2015 में पहले चरण में सिर्फ 56.22% वोटिंग हुई थी। यह इशारा है कि बिहार में मतदाताओं की सोच बदल रही है। खास बात यह रही कि महिलाओं की भागीदारी बहुत बढ़ी है। कई जगह महिलाओं की कतारें पुरुषों से लंबी थीं। यानी, अब बिहार में “महिला वोट बैंक” एक निर्णायक भूमिका निभा रहा है।

एनडीए बनाम महागठबंधन कौन भारी?

पहले चरण में मुकाबला सधा हुआ रहा। कुल 1314 उम्मीदवार मैदान में थे  एनडीए (BJP + JDU + LJP) के 131 प्रत्याशी महागठबंधन (RJD + कांग्रेस + वामदल) के 134 उम्मीदवार एनडीए की तरफ़ से  BJP – 48 सीटें, JDU – 57, LJP – 8 महागठबंधन की तरफ़ से: RJD – 73, कांग्रेस– 24, माले– 19 यह चरण बेहद अहम था, क्योंकि यही क्षेत्र बिहार की राजनीति की “धड़कन” कहलाता है — यहाँ के वोटर तय करते हैं कि हवा किस ओर बहेगी।

मंडल बनाम कमंडल की नई लड़ाई?

राजनीतिक विश्लेषकों के बीच अब चर्चा शुरू हो गई है — क्या यह “मंडल पार्ट 2” का आगाज़ है या फिर “कमंडल राजनीति” की वापसी? इतनी बड़ी संख्या में वोटिंग यह दिखाती है कि लोग अब सिर्फ जाति या धर्म नहीं, बल्कि रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और नेतृत्व की छवि पर भी सोच रहे हैं। लेकिन बिहार की राजनीति की जटिलता को देखते हुए, कोई भी पक्का निष्कर्ष 14 नवंबर को ही निकलेगा — जब नतीजे आएंगे।

महिलाओं की भूमिका

इस बार महिलाओं की उपस्थिति ने सबका ध्यान खींचा। कई गाँवों में महिलाओं ने खुद जागरूकता अभियान चलाए  पहले वोट, फिर काम” जैसे नारे लगाए। यह बदलाव बताता है कि अब महिलाएँ सिर्फ वोटर नहीं, बल्कि निर्णायक शक्ति” बन चुकी हैं। 2015 बनाम 2020  एक नज़र तुलना पर

वर्ष    वोटिंग प्रतिशत मुख्य संकेत

2015    56.22%            सामान्य रुचि

2020    64.69%            जन जागरूकता और उत्साह

यह 8% की बढ़ोतरी केवल आँकड़ा नहीं, बल्कि बिहार की राजनीतिक चेतना का संकेत है। पहली बार इतना स्पष्ट संदेश मिला कि जनता बदलाव चाहती है या तो दिशा बदलने के लिए, या फिर मौजूदा नेतृत्व को और मज़बूत करने के लिए।

लोगों की राय

गाँवों से लेकर कस्बों तक एक ही चर्चा इस बार वोटिंग ज़्यादा हुई, मतलब लोग अब अपने हक को समझने लगे हैं। कई युवाओं ने कहा कि अब “वोट” सिर्फ कर्तव्य नहीं, बल्कि “भविष्य तय करने का हथियार” है।

नतीजे क्या संदेश देंगे?

इतनी बड़ी वोटिंग के पीछे कई संकेत हैं जनता बदलाव के मूड में हो सकती है। या फिर यह मौजूदा सरकार पर भरोसे का वोट भी हो सकता है। यह भी संभव है कि जातीय समीकरणों की जगह अब विकास और नौकरियों ने जगह ली हो। जो भी हो, 64.69% वोटिंग ने यह तो साफ कर दिया है कि बिहार अब जाग चुका है। यह वही राज्य है जिसने पहले “मंडल राजनीति” को जन्म दिया था और अब शायद मंडल पार्ट 2 या नई सामाजिक राजनीति का मंच तैयार कर रहा है।

इतिहासिक वोटिंग का मतलब है

बिहार की जनता अब सिर्फ तमाशबीन नहीं रही, वह लोकतंत्र की दिशा तय कर रही है। महिलाएँ, युवा और ग्रामीण मतदाता  सबने मिलकर यह दिखाया कि बदलाव की हवा चल पड़ी है। अब देखना यह है कि 14 नवंबर को नतीजे किसके पक्ष में जाते हैं क्या यह मंडल पार्ट 2  का आगाज़ होगा या कमंडल एक बार फिर सियासत पर कब्जा करेगा?

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