बिहार की राजनीति में इस बार कुछ अलग और दिलचस्प देखने को मिल रहा है।चुनावी माहौल के बीच अब मंचों पर सिर्फ़ नेता ही नहीं, बल्कि सिनेमा, संगीत और सोशल मीडिया की दुनिया से जुड़े सितारे भी अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहे हैं। यह नई राजनीति का चेहरा है, जहां लोकप्रियता को वोटों में बदलने की कोशिश हो रही है। लेकिन इसी ग्लैमर के शोर में एक गंभीर सवाल उठ खड़ा हुआ है क्या बुनियादी मुद्दे अब पीछे छूटते जा रहे हैं?

 राजनीति में स्टार पावर की एंट्री

पिछले कुछ सालों में बिहार की सियासत में सेलिब्रिटी चेहरों की भूमिका लगातार बढ़ी है। भोजपुरी सिनेमा के सुपरस्टार खेसारी लाल यादव, लोकगायिका मैथिली ठाकुर और गायक रितेश पांडे जैसे नाम अब सिर्फ़ मनोरंजन की दुनिया तक सीमित नहीं हैं। राजनीतिक दलों को लगता है कि इनकी लोकप्रियता भीड़ जुटाने और वोटों को प्रभावित करने में अहम भूमिका निभा सकती है। इसी वजह से कई पार्टियां इन्हें अपने पाले में लाने की कोशिश में जुटी हैं। हालांकि, यह रणनीति चुनावी समीकरणों को भले ही बदल दे, पर इससे एक बड़ा सवाल भी उठता है क्या राजनीति सिर्फ़ लोकप्रियता की प्रतियोगिता बनकर रह जाएगी?

 असली मुद्दों की आवाज़ क्यों धीमी पड़ रही है?

बिहार आज भी कई गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहा है। शिक्षा प्रणाली कमजोर है, स्वास्थ्य सुविधाएं अपर्याप्त हैं और बेरोज़गारी का स्तर चिंताजनक है। हर साल लाखों युवा बेहतर रोजगार की तलाश में राज्य से बाहर पलायन कर रहे हैं। ग्रामीण इलाकों में विकास की रफ्तार बेहद धीमी है और बुनियादी ढांचा अब भी पिछड़ा हुआ है। इन मुद्दों पर बहस कम होती जा रही है। टीवी डिबेट्स और रैलियों में जहां पहले बेरोज़गारी, किसान समस्याएं या स्वास्थ्य ढांचे पर बात होती थी, अब वहां चर्चाओं का केंद्र बन गए हैं सेलिब्रिटी उम्मीदवार। मंचों पर तालियां लोकप्रिय चेहरों के लिए बजती हैं, लेकिन जनता के असली सवालों पर चुप्पी बनी रहती है।

 लोकतंत्र के लिए चुनौती या अवसर ?

राजनीति में ग्लैमर नया नहीं है। देश की संसद और विधानसभाओं में पहले भी अभिनेता, गायक और खिलाड़ी अपनी जगह बना चुके हैं। कुछ ने जनता की उम्मीदों पर खरा उतरते हुए अच्छा काम किया, जबकि कुछ सिर्फ़ प्रचार तक ही सीमित रह गए। बिहार के मतदाताओं के सामने अब वही पुराना सवाल दोबारा खड़ा है क्या वे लोकप्रिय चेहरों को चुनेंगे या उन उम्मीदवारों को, जो असली मुद्दों पर काम करने का वादा करते हैं?

लोकतंत्र में चुनाव केवल व्यक्तियों की लोकप्रियता की परीक्षा नहीं, बल्कि नीतियों और दृष्टिकोण की भी परीक्षा होती है। ग्लैमर राजनीति को दिलचस्प बना सकता है, लेकिन जनता की समस्याओं को हल नहीं कर सकता। इसलिए यह ज़रूरी है कि मतदाता चमकते चेहरों से परे जाकर सोचें और उन नेताओं को चुनें जो बेरोज़गारी, शिक्षा, स्वास्थ्य और विकास जैसे मुद्दों पर ठोस काम करने की क्षमता रखते हों। बिहार की राजनीति में आज असली सवाल यही है क्या लोकतंत्र की दिशा “ग्लैमर” तय करेगा या “मुद्दे”?

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