बात की शुरुआत एक नया सियासी सवाल बिहार की राजनीति में महागठबंधन के हालिया फैसले ने एक नई बहस छेड़ दी है। मल्लाह समाज, जिसकी आबादी करीब 2.5% है, उसे सत्ता में बड़ा पद यानी उपमुख्यमंत्री दिया गया। लेकिन दूसरी तरफ़, मुस्लिम समुदाय जिसकी आबादी करीब 17% है और जो बरसों से विपक्ष के लिए मज़बूत वोट बैंक माना जाता है, उसे एक बार फिर सत्ता की साझेदारी से दूर रखा गया। अब लोग यही पूछ रहे हैं कि जिस गठबंधन ने कभी नारा दिया था जिसकी जितनी भागीदारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी, वही आज इस नारे को भूल गया है।
असली सियासी गणित
बिहार में हमेशा आबादी के हिसाब से प्रतिनिधित्व” की बात होती रही है। लेकिन इस बार समीकरण उलट गया। 2.5% मल्लाह समाज सत्ता के सबसे ऊँचे पद पर है, जबकि 17% मुस्लिम समाज हाशिए पर है। यानी संख्या ज़्यादा, हिस्सेदारी कम। यह केवल आंकड़ों का मामला नहीं है,बल्कि यह दिखाता है कि अब राजनीति प्रतिनिधित्व नहीं बल्कि प्रतीक के दम पर चल रही है। सत्ता में किसी एक चेहरे को आगे रखकर यह दिखाने की कोशिश हो रही है कि सबको जगह मिली है, लेकिन हक़ की राजनीति कहीं पीछे छूट गई है।
मुसलमान मज़दूर बन गए हैं
बिहार की सियासत में मुसलमान हमेशा विपक्ष की ताक़त रहे हैं। वे हर चुनाव में मेहनत करते हैं वोट डालते हैं, प्रचार करते हैं, लेकिन सत्ता में उनकी भूमिका आज भी राजनीतिक मज़दूर तक सीमित है। हर बार कहा जाता है कि उन्हें सम्मानजनक प्रतिनिधित्व मिलेगा, पर हर चुनाव के बाद नतीजा वही मेहनत हमारी, कुर्सी किसी और की। यह अब एक परंपरा बन चुकी है। सत्ता में उनका नाम तो लिया जाता है, लेकिन असली फैसलों में उनकी आवाज़ नहीं सुनी जाती।
नारे से हकीकत
महागठबंधन की पहचान रही है सामाजिक न्याय की राजनीति। पर अब वही विचारधारा वोट बैंक की गिनती में सिमटकर रह गई है। अब किसी को प्रतीक बनाकर दिखाया जाता है कि सब बराबर हैं, लेकिन असल में बड़े वर्गों की हिस्सेदारी कम होती जा रही है। यह राजनीति का नया चेहरा है जहाँ न्याय नहीं, बल्कि दिखावा ज़्यादा मायने रखता है। जिस विचार से गठबंधन खड़ा हुआ था, अब वही विचार उसके लिए चुनौती बन गया है।
महागठबंधन की सच्चाई
गठबंधन का कहना है कि मल्लाह समाज को सत्ता में लाना सामाजिक संतुलन के लिए ज़रूरी था। लेकिन सवाल यह है कि क्या इस संतुलन को बनाने के लिए इतने बड़े समुदाय (17%) को नज़रअंदाज़ करना सही है? कई राजनीतिक जानकार मानते हैं कि गठबंधन ने नई जातीय राजनीति को पुराने भरोसे से ऊपर रख दिया है। यह रणनीति फिलहाल काम कर जाए, लेकिन लंबे समय में इससे भरोसे की राजनीति कमजोर पड़ती है।
खामोशी भी विरोध है
2020 के विधानसभा चुनाव में मुसलमानों का वोट विपक्ष की रीढ़ था। लेकिन अब वही वर्ग खामोश है। खामोशी कभी-कभी सबसे बड़ा विरोध होती है। अगर यह नाराज़गी वोटों में न भी झलके, तो मतदान से दूरी भी विपक्ष के लिए नुकसानदेह साबित हो सकती है। राजनीति में कभी-कभी बोलने वाला विरोध नहीं, बल्कि चुप रहने वाला मतदाता” ज़्यादा नुकसान करता है। आज मुस्लिम समुदाय में यही चुप्पी बढ़ रही है एक ऐसी चुप्पी, जो भरोसे के टूटने की निशानी है।
प्रतीक की सियासत
मल्लाह समुदाय से उपमुख्यमंत्री बनाना सामाजिक विविधता का संदेश ज़रूर देता है, लेकिन जब यह फैसला किसी बड़े समुदाय की हिस्सेदारी पर भारी पड़ जाए, तो यह संतुलन नहीं, असंतुलन कहलाता है। राजनीति अब भावनाओं की जगह फोटो-फ्रेम की राजनीति बन चुकी है जहाँ जो दिखता है, वही मायने रखता है। लोगों की भागीदारी नहीं, बल्कि तस्वीरों में उनकी मौजूदगी ही प्रतिनिधित्व कहलाने लगी है।
महागठबंधन के लिए चुनौती
महागठबंधन की सबसे बड़ी ताक़त उसकी नैतिक छवि रही है कि वह सामाजिक न्याय और बराबरी की राजनीति करता है। पर अब वही छवि दरकने लगी है। जब कोई पार्टी या गठबंधन अपने मूल सिद्धांत से समझौता करता है, तो जनता का भरोसा धीरे-धीरे खत्म हो जाता है। अब सवाल साफ़ है क्या महागठबंधन वोट का गणित साधेगा या न्याय की राजनीति बचाएगा? क्योंकि दोनों साथ-साथ नहीं चल सकते।
ये आंकड़े नहीं, एक संदेश हैं
यह कहानी सिर्फ़ प्रतिशतों की नहीं है। मल्लाह समुदाय को उपमुख्यमंत्री बनाना एक राजनीतिक फैसला है, लेकिन मुस्लिम समुदाय को लगातार सत्ता की भागीदारी से दूर रखना एक राजनीतिक संदेश है कि अब राजनीति समानता नहीं, बल्कि चयनात्मक न्याय पर चल रही है। बिहार की जनता यह सब देख रही है। सवाल अब यह नहीं कि कौन सत्ता में आया, बल्कि यह है कि कौन बार-बार बाहर रखा गया। जब 17% आबादी खुद को साझेदार नहीं, बल्कि मज़दूर समझने लगे, तो यह किसी भी दल या गठबंधन के लिए सिर्फ़ चेतावनी नहीं, बल्कि आने वाले राजनीतिक पतन का संकेत बन जाता है।
