बिहार में विधानसभा चुनाव 2025 का माहौल शबाब पर है। हर दल, हर नेता और अभिनेता  विकास, रोज़गार और पलायन की बात कर रहा है। इसी सुर-ताल से ताल मिलकर मीडिया भी विकास की बसुरी बजाने में व्यस्त हैं लेकिन विकास दिखेगा कैसा इस पर कोई बात करने को तैयार नहीं हैं। जिसके कारण इस चुनावी होड़ में पर्यावरण, हवा और पानी जैसे बुनियादी मुद्दे गायब हो गए हैं।

राज्य के कई ज़िले आज ज़हरीले पानी और प्रदूषित हवा की मार झेल रहे हैं, लेकिन इन पर न तो किसी पार्टी के घोषणापत्र में चर्चा है,न चुनावी मंचों और रैलियों में इस पर कोई सवाल उठा रहा हैं। जैसे बिहार को इसकी जरूरत ही नहीं है लेकिन पर्यावरण बिहार के लिए विकास से भी बहुत बड़ा मुद्दा हैं,आर्थिक विकास तो पार्टियां कर सकती हैं लेकिन मूलभूत लोगों की जरूरते हैं उसे खत्म करके विकास कैसे संभव हो सकता हैं। बिहार की हवा पानी मिट्टी की बात करे इससे जुड़े आकड़े बहुत ही डरावने तस्वीर पेश कर रहे हैं ।

 बिहार के कई शहरों में सांस लेना मुश्किल

सितंबर 2025 तक के AQI (Air Quality Index) के अनुसार, बिहार के अधिकांश प्रमुख शहरों की हवा “ख़राब” या “बहुत ख़राब” श्रेणी में है।

जिला / शहरऔसत AQI (सितंबर 2025)श्रेणीमुख्य कारण
पटना320बहुत ख़राबवाहन उत्सर्जन,
निर्माण कार्य,
कचरा जलाना
मुज़फ्फरपुर295ख़राबईंट-भट्ठे और
औद्योगिक धुआं
गया280ख़राबट्रैफिक और
धूल प्रदूषण
भागलपुर245मध्यमऔद्योगिक
अपशिष्ट
हाजीपुर270ख़राबखुले में कचरा
जलाना
राजगीर
(नालंदा)
265मध्यम से ख़राबपर्यटन और
वाहन प्रदूषण

100 से नीचे AQI सामान्य, 300 से ऊपर बेहद ख़राब माना जाता है। पटना की हवा दिल्ली से भी ज़्यादा प्रदूषित पाई गई है। AIIMS पटना के एक डॉक्टर के मुताबिक, फेफड़ों की बीमारी, अस्थमा और हार्ट की समस्याएँ अब सामान्य मरीजों में भी बढ़ रही हैं।

भूजल प्रदूषण की चपेट में 30 जिले के

राज्य के 38 में से 30 जिले अब भूजल प्रदूषण से प्रभावित हैं। इनमें आर्सेनिक (As) और फ्लोराइड (F) की मात्रा WHO के सुरक्षित मानक से कई गुना ज़्यादा है।

आर्सेनिक प्रभावित जिले (18 जिले):

जिलाऔसत स्तर (ppb)असर
पटना, बक्सर, भोजपुर80–100कैंसर, लीवर रोग
भागलपुर, मधेपुरा, कटिहार90–120त्वचा रोग, नसों की कमजोरी
सुपौल, समस्तीपुर, सारण70–100पेट संक्रमण
वैशाली, खगड़िया, दरभंगा60–90आंखों में जलन, बाल झड़ना
बेगूसराय, नवादा, जहानाबाद, सीवान65–100दांत व हड्डी रोग

कुल मिलाकर लगभग 2.2 करोड़ लोग आर्सेनिक प्रदूषित पानी पीने को मजबूर हैं। आर्सेनिक धीरे-धीरे शरीर में जमा होता है, और 5–10 साल में घातक बीमारियों का कारण बन जाता है। यह बिहार के लिए ‘साइलेंट प्वॉइज़न’ है।

आर्सेनिक से होने वाली प्रमुख बीमारियाँ

 फ्लोराइड प्रदूषण (12 जिले):

बीमारीलक्षणदीर्घकालिक असर
आर्सेनिकोसिस (Arsenicosis)त्वचा पर काले धब्बे, खुजलीकैंसर का खतरा
लीवर डैमेजथकान, उल्टी, पेट दर्दलीवर फेलियर
फेफड़े और त्वचा का कैंसरसांस लेने में तकलीफ़, त्वचा में घावकैंसर का बढ़ा जोखिम
न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डरहाथ-पैरों में सुन्नपननसों की कमजोरी
बाल झड़ना और त्वचा का सूखनाबाल और नाखून कमजोरस्थायी क्षति
जिलाऔसत फ्लोराइड स्तर (mg/L)प्रमुख असर
गया, औरंगाबाद, नवादा2.0–3.5दांत और हड्डियों की बीमारी
जमुई, कैमूर, बांका2.5–3.2स्केलेटल फ्लोरोसिस
नालंदा, रोहतास, लखीसराय1.8–2.5हड्डी दर्द, चलने में तकलीफ़
अरवल, शेखपुरा1.5–2.0दांतों पर दाग, बच्चों में कमजोरी

लगभग 1.3 करोड़ लोग फ्लोराइड से प्रभावित भूजल का इस्तेमाल कर रहे हैं।  गया और नवादा ज़िले में 35% से अधिक ग्रामीणों में फ्लोराइड से जुड़ी हड्डी की समस्या देखी जा रही है।

फ्लोराइड से उत्पन्न रोग

बीमारी लक्षण परिणाम
डेंटल फ्लोरोसिसदांतों पर पीले/भूरे धब्बेदांत कमजोर और बदरंग
स्केलेटल फ्लोरोसिसहड्डियों में जकड़न, पीठ दर्दस्थायी विकलांगता
जॉइंट पेनजोड़ो में सूजनगतिशीलता में कमी
थकान और कमजोरीमांसपेशियों में दर्दशरीर का संतुलन बिगड़ना

राजनीतिक दलों की हरित चुप्पी

सत्ताधारी दल निवेश और उद्योग पर फोकस कर रहा है, जबकि विपक्ष रोज़गार और भ्रष्टाचार पर हमला बोल रहा है। लेकिन न किसी के घोषणापत्र में स्वच्छ हवा, न किसी के एजेंडे में सुरक्षित पानी का ज़िक्र। जल-जीवन-हरियाली अभियान जैसी सरकारी योजनाएं प्रचार में तो दिखती हैं, पर असर सीमित है। टीवी और अख़बारों में राजनीति और रैलियों की चर्चा तो खूब होती है, लेकिनआर्सेनिक और फ्लोराइड से मरती ज़िंदगियों पर ख़ामोशी। लोग इसे अब भी प्राकृतिक समस्या” समझते हैं, जबकि यह नीतिगत लापरवाही का नतीजा है।

अधूरा विकास

बिहार में विकास की बातें हर मंच पर हैं  पर हवा, पानी और स्वास्थ्य की चर्चा कहीं नहीं। विकास चाहिए, लेकिन ज़हरीली सांस नहीं। नौकरी चाहिए पर ज़िंदा रहने लायक पानी भी। अब ज़रूरत है कि बिहार का राजनीतिक विमर्श ग्रीन डिवेलपमेंट (हरित विकास) की दिशा में मुड़े जहाँ विकास और पर्यावरण साथ-साथ चलें, न कि एक दूसरे के खिलाफ।

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