बिहार की राजनीति में मुस्लिम मतदाताओं की भूमिका हमेशा से अहम रही है। राज्य की लगभग 18 प्रतिशत आबादी होने के बावजूद मुस्लिम समाज को सत्ता और नीति निर्माण में वह जगह कभी नहीं मिली जिसकी वह लोकतांत्रिक रूप से हकदार है। चुनाव आते हैं, नेता उनके मोहल्लों में जाते हैं, वादे किए जाते हैं, “माई समीकरण” (मुस्लिम–यादव गठजोड़) की चर्चा होती है, पर जब टिकट बंटवारे और सत्ता की साझेदारी की बात आती है, तो यह समुदाय हाशिए पर धकेल दिया जाता है। यही वजह है कि आज भी कहा जा सकता है बिहार की सियासत में मुस्लिमों की हिस्सेदारी की हकमारी जारी है।
मुस्लिम वोट: निर्णायक, पर प्रतिनिधित्व में पीछे
| वर्ष | मुस्लिम विधायक |
| 1952 | 24 |
| 1957 | 25 |
| 1962 | 21 |
| 1967 | 18 |
| 1969 | 19 |
| 1972 | 25 |
| 1977 | 25 |
| 1980 | 28 |
| 1985 | 34 |
| 1990 | 20 |
| 1995 | 19 |
| 2000 | 29 |
| 2005 | 24 |
| 2005 (अक्टूबर) | 16 |
| 2010 | 19 |
| 2015 | 25 |
| 2020 | 19 |
| कुल | 390 मुस्लिम विधायक (1952–2020) |
यह डेटा साफ़ दिखाता है कि 1985 के बाद मुस्लिम प्रतिनिधित्व में निरंतर गिरावट आई है। लेकिन इसमें सुधार के लिए न तो मुस्लिम समाज से कोई आवाज़ उठाता है और नहीं किसी राजनीतिक पार्टी ही इस दिशा में कोई ठोस कदम उठाने के लिए तैयार हैं रामविलास पासवान ने जरूर मुस्लिम मुख्यमंत्री बनाने की बात कही थी ।
कौन-सी पार्टी ने दिया कितना प्रतिनिधित्व
सत्ता के समीकरण में जब-जब परिवर्तन हुआ, मुस्लिम राजनीति भी उसी अनुपात में सीमित होती गई।
| कांग्रेस | 195 | 157 | 38 |
| जनता दल | 45 | 33 | 12 |
| राजद | 56 | 44 | 11 |
| जदयू | 48 | 39 | 9 |
| एआईएमआईएम | 21 | 19 | 2 |
इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि कांग्रेस ने अपने शासनकाल में सबसे अधिक मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया, लेकिन मंडल युग के बाद जब राजद और जदयू उभरे, तो भी मुस्लिमों को नीति-निर्माण के केंद्र में नहीं लाया गया। आज भी मुस्लिम विधायकों को प्रायः अल्पसंख्यक कल्याण, औकाफ़ बोर्ड, या शिक्षा मंत्रालय जैसे सीमित विभागों तक ही सीमित रखा जाता है।
सिर्फ एक मुस्लिम मुख्यमंत्री
आजादी के बाद से अब तक बिहार में सिर्फ एक मुस्लिम मुख्यमंत्री बने — अब्दुल गफूर (1973–1975)। यह विडंबना है कि 18% आबादी वाले समुदाय का सिर्फ एक व्यक्ति राज्य की सर्वोच्च कुर्सी तक पहुंच सका। उसके बाद कोई भी मुस्लिम नेता इस स्तर तक नहीं पहुंच पाया। इससे साफ़ झलकता है कि सत्ता की ऊँचाइयों पर मुस्लिम नेतृत्व को अब भी स्वीकार्यता नहीं मिली है।
‘माई समीकरण’ का मिथक
लालू प्रसाद यादव के दौर में “माई समीकरण” (मुस्लिम-यादव गठजोड़) को सामाजिक न्याय की राजनीति का प्रतीक बताया गया। 1990 के दशक में यह गठजोड़ मजबूत भी रहा और सत्ता की कुंजी बना। परंतु, बीते दो दशकों में यह समीकरण कमजोर हुआ है। मुस्लिम मतदाता अब पहले जैसी एकतरफा एकजुटता नहीं दिखा रहा। 2015 में 25 मुस्लिम विधायक बने, पर 2020 में यह घटकर 19 रह गया यह गिरावट दर्शाती है कि न तो वोट पूरी तरह एक दिशा में जा रहे हैं और न ही उन्हें वैसा प्रतिनिधित्व मिल रहा है जैसा कभी लालू युग में दिखता था।
पसमांदा मुस्लिम: दोहरी उपेक्षा
मुस्लिम समाज के भीतर भी असमानता है। पसमांदा मुस्लिम (जैसे अंसारी, कुंजड़ा, नट, राईन आदि) समुदाय जनसंख्या में बड़ी संख्या में हैं, लेकिन राजनीति में उनकी हिस्सेदारी बेहद सीमित है। 2020 में चुने गए 19 मुस्लिम विधायकों में सिर्फ 5 पसमांदा थे। इससे साफ़ है कि सत्ता में मुस्लिमों की जो थोड़ी बहुत मौजूदगी है, वह भी उच्चवर्गीय मुस्लिमों (शेख, सय्यद, पठान) के हाथ में केंद्रित है। इस आंतरिक असमानता ने मुस्लिम राजनीति को और कमजोर कर दिया है।
राजनीतिक रणनीति: ‘वोट चाहिए, नेता नहीं’
राजनीतिक दलों के लिए मुस्लिम समाज “वोट बैंक” है एक ऐसा समूह जो चुनाव में निर्णायक भूमिका निभा सकता है, पर जिसे टिकट देने में दल हमेशा “जोखिम” देखते हैं। दल मानते हैं कि अगर किसी सीट पर मुस्लिम उम्मीदवार दिया गया, तो “ध्रुवीकरण” के कारण विरोधी समुदाय के वोट एकजुट हो जाएंगे। इस डर ने दलों को मुस्लिम नेतृत्व को उभारने से रोके रखा है। नतीजा यह है कि मुसलमान वोट देते हैं, पर जीतने वाले उम्मीदवारों की सूची में उनकी उपस्थिति घटती जाती है।
विश्लेषक क्या कहते हैं
राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं “बिहार में मुसलमानों की सियासी ताकत सिर्फ मतपेटी तक सिमट गई है। दलों ने उन्हें टिकट देने से कतराया क्योंकि उन्हें ‘वोट दिलाने वाला, पर जीतने में कमजोर’ उम्मीदवार माना जाता है। अब समय है कि मुस्लिम समाज ‘प्रेशर पॉलिटिक्स’ अपनाए और अपने हक की राजनीतिक हिस्सेदारी की मांग संगठित तरीके से करे। उनके अनुसार, जब तक मुस्लिम समाज अपने बीच से संगठनात्मक नेतृत्व नहीं खड़ा करेगा, तब तक उसका वोट दूसरों की जीत का माध्यम बना रहेगा, न कि अपनी आवाज़ का ज़रिया।
आगे की दिशा: संगठित नेतृत्व की जरूरत
2025 के विधानसभा चुनावों की तैयारी में सभी दल फिर से मुस्लिम वोट पर निगाहें गड़ाए हुए हैं। राजद-जदयू गठबंधन हो या बीजेपी, सीमांचल और शहरी इलाकों के मुस्लिम मतदाताओं को लुभाने की कोशिशें तेज हैं। लेकिन यदि टिकट बंटवारे में प्रतिनिधित्व का अनुपात नहीं सुधरा, तो मुस्लिम समाज की राजनीतिक हकमारी का सिलसिला जारी रहेगा। अब यह समुदाय खुद यह तय करे कि वह सिर्फ वोट देगा या अपनी हिस्सेदारी की मांग भी करेगा। पसमांदा संगठन, मुस्लिम युवा समूह और सिविल सोसाइटी के प्रयास इस दिशा में बढ़ रहे हैं, पर अभी उन्हें व्यापक जनाधार की जरूरत है।
बिहार की सियासत में मुस्लिमों की भूमिका निर्विवाद रूप से अहम है , वे चुनावी समीकरणों को बदल सकते हैं, पर खुद सत्ता के केंद्र में नहीं पहुँच पाए। 1952 से 2020 तक के आंकड़े बताते हैं कि मुस्लिमों की हिस्सेदारी उनकी जनसंख्या के अनुपात से आधी भी नहीं रही। सिर्फ एक मुख्यमंत्री, सीमित मंत्री, और लगातार घटते विधायक यह स्थिति बताती है कि हकमारी अब भी जारी है। अगर मुस्लिम समाज को अपनी राजनीतिक ताकत का सही इस्तेमाल करना है, तो उसे वोट से आगे बढ़कर नेतृत्व निर्माण और संगठित दबाव राजनीति (Pressure Politics) की राह अपनानी होगी। जब तक राजनीतिक दलों पर यह दबाव नहीं बनेगा कि “हम वोट देंगे, तो सीट भी चाहिए,” तब तक यह असंतुलन बना रहेगा। बिहार की राजनीति में मुस्लिमों की हकमारी महज सांख्यिकीय नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक असमानता की कहानी है। यह कहानी तब बदलेगी जब मुस्लिम समाज अपनी राजनीतिक एकजुटता और आत्मनिर्भर नेतृत्व के ज़रिए यह साबित करेगा कि अब वह सिर्फ वोट नहीं, वोट के साथ हिस्सेदारी भी मांगता है।
बिहार में मुसलमानों की आबादी लगभग 18 प्रतिशत है। यह वोट बैंक लगभग 60 से अधिक विधानसभा सीटों पर परिणाम तय करने की क्षमता रखता है। सीमांचल, तिरहुत और मगध क्षेत्रों में कई सीटें ऐसी हैं जहां मुस्लिम मतदाता निर्णायक स्थिति में हैं। परंतु, जब इन क्षेत्रों में टिकट वितरण का विश्लेषण किया जाता है तो तस्वीर बेहद असंतुलित दिखाई देती है। 1952 से लेकर 2020 तक राज्य विधानसभा में कुल 390 मुस्लिम विधायक चुने गए, यानी औसतन प्रत्येक विधानसभा में मुस्लिम प्रतिनिधित्व केवल 8–9 प्रतिशत के बीच रहा। यह आंकड़ा उनकीख्या के अनुपात से लगभग आधा है।
