Bihar Election 2025 बिहार में 2025 का विधानसभा इलेक्शन सिर्फ सत्ता की अदला–बदली का मामला नहीं होता है, बल्कि यह राज्य की सियासत की नई दिशा और दशा तय करने वाला है। बिहार के 243 सीटों वाली विधानसभा के लिए होने वाले इस चुनाव में राजनीतिक पार्टी की सक्रियता चरम पर पहुँच चुका है। एनडीए और महागठबंधन के बीच मुख्य मुकाबला माना जा रहा है, लेकिन छोटे दल और नए खिलाड़ी भी इस बार सियासत का खेल बिगाड़ने और बनाने की ताकत रखते हैं।
पिछले परिणाम का प्रभाव
2020 के विधानसभा चुनाव में एनडीए गठबंधन ने बहुमत पाकर सत्ता संभाली थी। भाजपा 74 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी, जबकि जनता दल यूनाइटेड को 43 सीटें से संतोष करना पड़ा था। राजद 75 सीटें पाकर सता के दौड़ में पीछे रह गई। उस चुनाव में नीतीश कुमार की लोकप्रियता में गिरावट साफ-साफ दिखाई दी, लेकिन भाजपा के साथ गठबंधन ने उन्हें फिर मुख्यमंत्री के कुर्सी पर बैठा दिया।
अब 2025 के बिहार इलेक्शन में सवाल यह खड़ा हो गया है कि क्या नीतीश बतौर मुख्यमंत्री एक बार फिर जनता का भरोसा जीत पाएंगे अथवा तेजस्वी यादव इस बार सत्ता के शीर्ष स्थान तक पहुंचने में सफल होंगे।
2024 लोकसभा चुनाव का असर
लोकसभा चुनाव 2025 जो पिछले साल ही सम्पन्न हुआ था में बिहार की अवाम ने 40 सीटों में से भाजपा को 17, जद(यू) को 12, और लोजपा (रामविलास) को 5 सीटें दी हैं। राजद और कांग्रेस को अवाम ने मायूसी देना ही मुनासिब समझा। यह नतीजे एनडीए खेमे को मजबूत आत्मविश्वास दे रहे हैं। राजनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि लोकसभा का असर विधानसभा इलैक्शन पर पूरी तरह नहीं पड़ता, लेकिन वोटरों का मनोविज्ञान इससे ज़रूर प्रभावित होता है।
इस बार के इलैक्शन का आगाज सुशासन से थकान तक का सफर से शुरू होता दिखाई दे रहा हैं। एनडीए की ओर से भाजपा और जद(यू) मिलकर मैदान में उतर रहे हैं। भाजपा विकास और “डबल इंजन सरकार” का नारा बुलंद कर रही है, जबकि नीतीश कुमार अपनी सरकार की योजनाओं जैसे साइकिल योजना, महिला आरक्षण, छात्रवृत्ति और सड़क–बिजली सुधार को गिनवाते हुये थकती नही दिखाई दे रही हैं। हालांकि, लगातार लंबे समय से सत्ता में बने रहने से “एंटी–इन्कम्बेंसी” (सत्ता विरोधी लहर) की संभावना भी इंकार नहीं किया जा सकता है।
महागठबंधन नई ऊर्जा से लबरेज
गौरतलब हो कि महागठबंधन का चेहरा इस बार तेजस्वी यादव को बनाया गया हैं। ये बेरोजगारी को सबसे बड़ा मुद्दा बनाकर युवा वोटरों के बीच जा रहे हैं। इनका नारा है—“10 लाख नौकरी सिर्फ़ वादा नहीं, गारंटी है।” कांग्रेस और वाम दल दोनों पार्टियां तेजेस्वी के साथ खडी हैं। महागठबंधन शिक्षा, स्वास्थ्य और कृषि संकट को मुद्दा बनाकर जनता के बीच जाने की तैयारी कर रहा है।
छोटे दलों की सियासी सतरंज
90 के दस्क के बाद से बिहार की राजनीति में छोटे दलों की भूमिका अक्सर निर्णायक रही है। लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) चिराग पासवान के नेतृत्व में दलित वोटों पर असर डाल सकती है। राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (उपेंद्र कुशवाहा) पिछड़ा वर्ग और खासकर कुशवाहा वोट बैंक को टारगेट कर रही है। एआईएमआईएम (ओवैसी की पार्टी) सीमांचल क्षेत्र में मुस्लिम मतदाताओं पर पकड़ बनाए रखने की कोशिश कर रही है। इन दलों की मजबूती या कमजोरी सीधे–सीधे बड़े गठबंधनों के समीकरण को प्रभावित करेगी।
बिहार की राजनीति में जाति का महत्व हमेशा रहा है । इसी का नतीजा हैं कि बिहार में जाति और विकास जंग चलता रहता हैं जिसमें हमेशा जीत जाति कि ही होती हैं लेकिन इस बार जाति को मात देने और विकास की जीत को सुनिश्चित करने के लिए भी एक दल आ गया हैं। राजद यादव–मुस्लिम समीकरण पर टिके हैं।भाजपा–जद(यू) गठबंधन सवर्ण, कुर्मी, दलित और महादलित मतदाताओं को साधने की कोशिश कर रहा है। छोटे दल अपनी–अपनी जातीय पकड़ के आधार पर असर डालते हैं।लेकिन इस बार युवाओं और शहरी मतदाताओं में “जाति से ज़्यादा नौकरी” की मांग जोर पकड़ रही है। यही वजह है कि सभी दल रोजगार और विकास को चुनावी घोषणापत्र का मुख्य हिस्सा बना रहे हैं।
प्रमुख चुनावी मुद्दे
रोजगार और पलायन – हर साल लाखों युवा रोज़गार की तलाश में बिहार छोड़कर बाहर जाते हैं। प्रवासी मजदूरों की वापसी और उन्हें स्थायी काम दिलाना सबसे बड़ा मुद्दा है।
शिक्षा और स्वास्थ्य -सरकारी स्कूलों और अस्पतालों की बदहाली जनता को सबसे अधिक परेशान करती है। ग्रामीण इलाकों में शिक्षक और डॉक्टर की कमी हमेशा से चर्चा का विषय है।
कृषि संकट- बिहार के किसान बाढ़ और सुखाड़ से जूझते हैं। धान और गेहूं का समर्थन मूल्य, सिंचाई की सुविधा और बीज–खाद की उपलब्धता मुख्य मांग हैं।
कानून–व्यवस्था और भ्रष्टाचार -अपराध, नशाखोरी और अफसरशाही पर लगाम कसना दलों के लिए बड़ी चुनौती है।
महंगाई और महिला सुरक्षा- महंगाई का असर हर घर तक है, वहीं महिलाओं की सुरक्षा और स्वावलंबन को लेकर वादे बढ़ गए हैं।
महिला मतदाताओं का रुझान
2010 से महिला वोटिंग प्रतिशत लगातार पुरुषों से अधिक रहा है। शराबबंदी, स्वास्थ्य सेवाओं और कल्याणकारी योजनाओं ने महिला वोटरों को राजनीति में सक्रिय किया है। एनडीए इस आधार पर खुद को मज़बूत मानता है, जबकि महागठबंधन महिलाओं को नौकरी और स्वरोजगार का वादा कर रहा है। युवा वोटर निर्णायक बिहार की आबादी में 35 साल से कम उम्र के लोगों की संख्या लगभग 58% है। यही युवा इस चुनाव की दिशा तय करेंगे। पटना विश्वविद्यालय के एक छात्र ने कहा— “नेताओं से बहुत वादे सुने, लेकिन अब नौकरी कब मिलेगी यही असली सवाल है।”
शहरी बनाम ग्रामीण चुनावी मुद्दे
ग्रामीण इलाकों में सड़क, बिजली, पानी, सिंचाई और शिक्षा मुख्य मुद्दे हैं। शहरी इलाकों में बेरोजगारी, महंगाई, ट्रैफिक और प्रदूषण को लेकर नाराजगी दिख रही है। विशेषज्ञों की राय राजनीतिक विश्लेषक प्रो. अरुण कुमार कहते हैं “यह चुनाव जाति बनाम विकास की लड़ाई है। अगर युवा वोटर जातीय समीकरण से ऊपर उठकर वोट करेंगे तो बिहार की राजनीति की तस्वीर बदल सकती है।” वहीं वरिष्ठ पत्रकार अंजलि सिंह का मानना है कि—”महिला मतदाता इस बार भी सत्ता के समीकरण को बदल सकती हैं। उनके बीच शराबबंदी और महंगाई दोनों बड़े मुद्दे हैं।”
2020 विधानसभा चुनाव परिणाम
- राजद – 75 सीट
- भाजपा – 74 सीट
- जद(यू) – 43 सीट
- कांग्रेस – 19 सीट
- वाम दल – 16 सीट
- लोजपा – 1 सीट
- अन्य – 15 सीट
(बहुमत का आंकड़ा: 122 सीट)
2024 लोकसभा चुनाव परिणाम (बिहार की 40 सीटें)
- भाजपा – 17
- जद(यू) – 12
- लोजपा (रामविलास) – 5
- राजद – 3
- कांग्रेस – 2
- अन्य – 1
बिहार की जनसंख्या और मतदाता प्रोफ़ाइल
- कुल जनसंख्या: 13 करोड़ (2021 अनुमान)
- मतदाता संख्या: 7.2 करोड़
- महिला मतदाता: 3.5 करोड़
- युवा मतदाता (18–35 वर्ष):58%
- शहरी मतदाता: 12%
- ग्रामीण मतदाता: 88%
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 पूरी तरह से रोमांचक और ऐतिहासिक होने वाला है। सत्ता पर काबिज़ एनडीए अपने कामकाज और योजनाओं के दम पर मैदान में है, तो विपक्ष महागठबंधन युवाओं और बदलाव की राजनीति का नारा दे रहा है।छोटे दलों और नए खिलाड़ियों की मौजूदगी मुकाबले को और पेचीदा बना रही है। जनता का जनादेश किसे मिलेगा, यह तो नवंबर में आने वाले नतीजे ही बताएंगे,लेकिन इतना तय है कि यह चुनाव केवल बिहार ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति की दिशा भी प्रभावित करेगा।
