ग्रीनवॉशिंग को समझना बहुत आसान है लेकिन इससे बचना बहुत ही मुश्किल है क्योकि आज कल बाजार में हर दूसरा उत्पाद खुद को “इको-फ्रेंडली”, “ग्रीन”, “नेचुरल” या “पर्यावरण के लिए सुरक्षित” बताने लगा है। खरीदारी करते समय आपने देखा होगा कि हरे रंग की पैकेजिंग, पत्तों की तस्वीरें और बड़े-बड़े दावे देखकर किये गये होगे इसे देखकर आप को लगता है कि वे पर्यावरण के लिए अच्छा काम कर रहे हैं। लेकिन कई बार हकीकत कुछ और ही होती है। इसी को ग्रीनवॉशिंग कहा जाता है। what is greenwashing ? ग्रीनवॉशिंग का सीधा मतलब है कि जब कोई कंपनी या संस्था पर्यावरण के नाम पर खुद को अच्छा दिखाने की कोशिश करती है, लेकिन असल में उसके काम या प्रोडक्ट से पर्यावरण को नुकसान ही होता है। उसे ही ग्रीनवॉशिंग कहा जाता कहा जाता है
यह कैसे काम करती है ?
आमतौर पर ग्रीनवॉशिंग बहुत चालाकी से की जाती है। कंपनियां सीधे झूठ नहीं बोलतीं, बल्कि अधूरी जानकारी देती हैं। जैसे पैकेट पर लिख दिया जाता है “नेचुरल” या “ग्रीन”, लेकिन यह नहीं बताया जाता कि उसमें कौन-कौन से केमिकल हैं या उसे बनाने में कितना प्रदूषण हुआ है। कई बार सिर्फ एक छोटे बदलाव को बड़ा दिखाकर प्रचार किया जाता है। मसलन, अगर किसी प्रोडक्ट की पैकेजिंग थोड़ी कम प्लास्टिक की हो गई, तो उसे “पर्यावरण के लिए सुरक्षित” बता दिया जाता है, जबकि बाकी पूरी प्रक्रिया पहले जैसी ही प्रदूषण फैलाने वाली रहती है।
रोजमर्रा की जिंदगी से ग्रीनवॉशिंग के उदाहरण
Greenwashing examples ग्रीनवॉशिंग को समझना मुश्किल नहीं है, अगर हम अपने आसपास देखें तो बहुत से प्रोडक्ट ऐसे हैं जिनकी पैकेजिंग पूरी तरह प्लास्टिक की होती है, लेकिन ऊपर “100% Eco-Friendly” लिखा होता है। कुछ कपड़ों के ब्रांड अपने एक छोटे से कलेक्शन को “सस्टेनेबल” कहकर प्रचार करते हैं, जबकि बाकी कपड़े पहले की तरह बड़े पैमाने पर वेस्ट और प्रदूषण पैदा करते हैं। इसी तरह कई ब्यूटी और कॉस्मेटिक प्रोडक्ट खुद को “हर्बल” या “नेचुरल” बताते हैं, लेकिन उनके अंदर ऐसे केमिकल होते हैं जो न तो त्वचा के लिए पूरी तरह सुरक्षित होते हैं और न ही पर्यावरण के लिए।
क्यों बढ़ रही है ग्रीनवॉशिंग ?
असल वजह है लोगों में बढ़ती पर्यावरण को लेकर चिंता। आज ग्राहक चाहता है कि वह ऐसा प्रोडक्ट खरीदे जिससे प्रकृति को नुकसान न हो। कंपनियां इसी सोच का फायदा उठाती हैं। पर्यावरण-अनुकूल इमेज बनाने से ब्रांड की साख बढ़ती है और बिक्री भी। लेकिन सभी कंपनियां सच में बदलाव करना नहीं चाहतीं, क्योंकि उसमें लागत और मेहनत दोनों ज्यादा लगती है। इसलिए कुछ कंपनियां सिर्फ मार्केटिंग के सहारे खुद को “ग्रीन” दिखाने लगती हैं।
इसका नुकसान किसे होता है?
ग्रीनवॉशिंग का सबसे बड़ा नुकसान उपभोक्ताओं को होता है। लोग अच्छे इरादे से प्रोडक्ट खरीदते हैं, लेकिन अनजाने में ऐसे उत्पादों का समर्थन कर बैठते हैं जो पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रहे होते हैं। इसके अलावा, जो कंपनियां सच में पर्यावरण के लिए सही काम कर रही होती हैं, उन्हें भी नुकसान होता है। क्योंकि जब हर कोई खुद को “ग्रीन” बताने लगे, तो असली और नकली के बीच फर्क करना मुश्किल हो जाता है।
सरकार और नियमों की जरूरत
जानकारों का मानना है कि ग्रीनवॉशिंग पर रोक लगाने के लिए सख्त नियम जरूरी हैं। कई देशों में कंपनियों से कहा जाता है कि अगर वे पर्यावरण से जुड़ा कोई दावा करें, तो उसके पीछे ठोस सबूत भी दें। भारत में भी भ्रामक विज्ञापनों पर कार्रवाई के नियम मौजूद हैं, लेकिन विशेषज्ञों के मुताबिक पर्यावरण से जुड़े दावों के लिए अलग और साफ दिशा-निर्देश होने चाहिए, ताकि आम लोग भ्रमित न हों।
आम लोग कैसे बचें?
आम उपभोक्ता कुछ सावधानियां अपनाकर ग्रीनवॉशिंग से बच सकता है। सिर्फ पैकेजिंग और विज्ञापन देखकर भरोसा न करें। प्रोडक्ट के पीछे लिखी जानकारी ध्यान से पढ़ें। यह देखें कि कंपनी ने सच में क्या बताया है और क्या सिर्फ अच्छे शब्दों का इस्तेमाल किया गया है। अगर किसी प्रोडक्ट पर बहुत बड़े दावे हों लेकिन ठोस जानकारी न हो, तो सतर्क रहना बेहतर है। धीरे-धीरे जागरूकता बढ़ेगी तो कंपनियों पर भी सही काम करने का दबाव बनेगा। ग्रीनवॉशिंग आज के समय की एक गंभीर समस्या है। पर्यावरण बचाने की बात हर कोई कर रहा है, लेकिन जरूरी है कि यह बात सिर्फ शब्दों तक सीमित न रहे। जब तक कंपनियां ईमानदारी से काम नहीं करेंगी और उपभोक्ता सवाल नहीं पूछेंगे, तब तक ग्रीनवॉशिंग चलती रहेगी। पर्यावरण की रक्षा सिर्फ विज्ञापनों से नहीं, बल्कि असली बदलाव से होगी। और उस बदलाव की शुरुआत जागरूक उपभोक्ता से ही होती है।
डिस्क्लेमर: यह लेख केवल सामान्य जानकारी और जन-जागरूकता के उद्देश्य से लिखा गया है। इसमें किसी कंपनी या ब्रांड पर सीधा आरोप नहीं किया गया है।
